इंदौर। जिस आंगन से रोज बच्चे माता-पिता को बाय करते हुए स्कूल जाते थे, वहां से वे हमेशा के लिए विदा हो गए। जिस वक्त मां उन्हें स्कूल भेजने में जुटती थी, शनिवार को लोग बच्चों की अर्थी सजा रहे थे। मां तो अपने कलेजे के टुकड़े (बच्ची) का शव छोड़ना ही नहीं चाह रही थी। वह बार-बार गले लगकर बेसुध हो रही थी।

हादसे में मृत बच्चों (श्रुति लुधियानी, हरमीत कौर, कृति अग्रवाल व स्वास्तिक पंड्या) की खातीवाला टैंक से अंतिम यात्रा निकली। सबका पीपल्यापाला मुक्तिधाम पर अंतिम संस्कार किया गया। सबसे पहले श्रुति लुधियानी का शव रवाना किया गया। उसे उसी तरह तैयार किया गया, जैसे स्कूल भेजने के पहले किया जाता था। अंतिम सफर के लिए उसकी पसंदीदा कार फॉर्च्यूनर को फूलों से सजाया गया था। शव पर लाल चुनरी ओढ़ाई और लाल बिंदी भी लगाई।

बहन का शव देखते ही बिलख पड़ा भाई

अलमारी में शील्ड और ट्रॉफियां भरी थीं। पिता-भाई व मां की फोटो लगाने के लिए उसने कुछ दिन पहले ही कोलॉज तैयार किया था। कहती थी देखें डायबिटीज तेजी से फैल रहा है। बड़ी होकर डॉक्टर बनूंगी। यह सब याद करके मां का दिल भरआया। आंसुओं में भीगी यादें उन चारों घरों में रह-रहकर सिसक रही थीं, जिन्होंने अपने कलेजे के टुकड़ों को हादसे में खो दिया। सुबह ठीक 11 बजे कृति की शवयात्रा जैसे ही रवाना हुई, पूरे मोहल्ले में मातम छा गया।

परिजन सुबह कृति के भाई कुशाग्र के आने का इंतजार कर रहे थे। कुशाग्र मुंबई में पढ़ता है। रात को फ्लाइट चूकने के कारण वह सुबह पहुंचा। बहन का शव देखते ही बिलख पड़ा। मां नीति भी बदहवास हो गई। नानी शकुंतला मौसी अंशुबाला के मुताबिक बेटी पढ़ने में होशियार थी। परिजन का आरोप है कि स्कूल से हादसे की सूचना नहीं मिली। नीति शाम 5 बजे तक बस स्टॉप पर बेटी का इंतजार कर रही थी। फिर सूचना मिली तो हतप्रभ रह गई। पति प्रशांत को कॉल किया तो बताया घायल बॉम्बे अस्पताल में भर्ती है। वहां डॉक्टर व पुलिस ने बताया कृति की मौत हो गई।

जीकर क्या करूंगी

खातीवाला टैंक के आर सेक्टर से ठीक 12 बजे ट्रैवल्स संचालक गुरजीतसिंह कुमार की बेटी हरमीत कौर (खुशी) की अर्थी उठी। परिजन जब शवयात्रा की तैयारी कर रहे थे तो मां जसप्रीत कौर बेटी के शव से लिपट कर बैठी थी। जैसे ही उसे बाहर लेकर आए वह भी बदहवास होकर पीछेपीछे दौड़ने लगी। पति गुरजीतसिंह और भाई गुरप्रीत ने रोकने की कोशिश की। उसने कहा मेरी बेटी जा रही है। मैं जीकर क्या करूंगी। पम्मी जमीन पर सिर पटक कर बेहोश हो गई। गुरप्रीत के मुताबिक स्कूल जाने के पहले खुशी ने कहा शाम को सेंडविच तैयार रखना। मां ने सेंडविच बनाकर रखा था। वह बार-बार बस स्टॉप की तरफ देख रही थी। रात में घटना की सूचना मिली तो वह सन्ना रह गई।

भाई के शव से लिपटकर बोली बहन, तू मुझे क्यों छोड़ गया

श्रीजी टॉवर से स्वास्तिक पंड्या की अंतिम यात्रा निकली। पिता भोलेनाथ बड़विल (ओडीशा) में माइंस कंपनी में मैनेजर हैं। शुक्रवार को फ्लाइट में देरी हो गई थी। सुबह करीब 10.30 बजे घर पहुंचे तब शव को अस्पताल से जाया गया। जैसे ही स्वास्तिक का शव घर पहुंचा बड़ी बहन श्रेया और मां मंजुला लिपट कर रोने लगी। श्रेया भी डीपीएस में पढ़ती है। वह जाती तो दूसरी बस से है, लेकिन आती स्वास्तिक के साथ थी। वह शव से लिपट खूब रोई। श्रेया बार-बार एक ही बात बोल रही थी। अब मैं किसके हाथ में राखी बाधूंगी। मुझे छोड़कर क्यों जा रहा है। मां मंजुला निजी स्कूल में टीचर है। दोपहर को स्टाफ और महिला कर्मचारी भी पहुंची थी।


 

मैं बस स्टॉप पर खड़ी रही.., बेटा अस्पताल में तड़प रहा था... स्कूल ने बताया भी नहीं

हादसे में श्रीजी टॉवर में ही रहने वाला पार्थ पिता मनीष वसानी भी घायल हुआ है। उसका बॉम्बे अस्पताल में उपचार चल रहा है। मां रीना के मुताबिक रोजाना 4.30 बजे तक बच्चे घर आ जाते थे। शुक्रवार देर शाम तक बस नहीं आने पर मंजुला के पास किसी का कॉल आया। उसने बताया डीपीएस की बस का एक्सीडेंट हुआ है। स्कूल कॉल किया, लेकिन फोन व्यस्त मिला। मनीष को घटना बताई तो वह अस्पताल पहुंचे। पार्थ आईसीयू में तड़प रहा था।