इंदौर: मध्य प्रदेश विधानसभा चुनावों में बतौर प्रत्याशी करीब तीन दशक से अजेय बीजेपी महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने गुरुवार को इस बात को खारिज किया कि अपने बेटे आकाश को टिकट दिलाने के लिए इस बार उन्हें खुद की चुनावी दावेदारी छोड़नी पड़ी. विजयवर्गीय ने यह दावा भी किया कि उन्होंने बीजेपी आलाकमान से अपने 34 वर्षीय बेटे के लिए टिकट नहीं मांगा था. 

कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, 'इस बार खुद चुनाव लड़ने में मैंने ज्यादा रुचि नहीं ली, क्योंकि फिलहाल मुझ पर बीजेपी संगठन की महती जिम्मेदारियां हैं.' बता दें इंदौर, बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव का गृह नगर है.

'मेरे पास पश्चिम बंगाल का प्रभार भी है' 
उन्होंने कहा, 'चूंकि मेरा मुख्यालय दिल्ली हो गया है और मेरे पास पश्चिम बंगाल का प्रभार भी है. लिहाजा मुझे लगता है कि मैं अभी इंदौर जिले की किसी सीट से चुनाव लड़कर बाद में मतदाताओं से न्याय करने की स्थिति में नहीं हूं.'   उन्होंने कहा, 'मैं नहीं चाहता कि क्षेत्रीय मतदाता मेरे बारे में टिप्पणी करें कि एक बार चुनाव जीतने के बाद मैंने उन्हें दोबारा अपना मुंह नहीं दिखाया.' 

कैलाश विजयवर्गीय के नाम इंदौर जिले की अलग-अलग सीटों से वर्ष 1990 से लगातार छह बार विधानसभा चुनाव जीतने का रिकॉर्ड दर्ज है. वह वर्ष 2008 और वर्ष 2013 के पिछले दो चुनावों के दौरान जिले के डॉ. अम्बेडकर नगर (महू) क्षेत्र से चुनकर विधानसभा पहुंचे थे. 

बहरहाल, इस बार बीजेपी ने महू सीट से विजयवर्गीय के स्थान पर पार्टी की प्रदेश इकाई की उपाध्यक्ष उषा ठाकुर पर उम्मीदवारी का भरोसा जताया है. ठाकुर, वर्ष 2013 के पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान इंदौर-3 सीट से चुनी गई थीं. लेकिन इस बार उन्हें अपनी पुरानी सीट छोड़नी पड़ी है, क्योंकि इंदौर-3 से विजयवर्गीय के बेटे आकाश को टिकट दिया गया है. आकाश (34) अपने जीवन का पहला चुनाव लड़ने जा रहे हैं. 

'बेटे को टिकट देने का फैसला पार्टी का' 
कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, 'शायद कोई भी व्यक्ति मेरी इस बात पर विश्वास नहीं करेगा कि मैंने हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से एक बार भी नहीं कहा कि मेरे बेटे को चुनावी टिकट दिया जाए. उसे टिकट देने का फैसला मेरी पार्टी का है. हालांकि, मैं इस फैसले का स्वागत करता हूं.'

बीजेपी महासचिव ने एक सवाल पर इंदौर जिले की नौ सीटों के चुनावी टिकटों को लेकर लोकसभा अध्यक्ष और क्षेत्रीय सांसद सुमित्रा महाजन के साथ अपनी कथित खींचतान को खारिज किया. स्थानीय शब्दावली में इस रस्साकशी को "ताई (महाजन) और भाई (विजयवर्गीय) की लड़ाई" की उपमा दी जाती है.