इन्दौर । भागवत कथा हमारे अंदर की पशुता को हटा कर मनुष्यत्व की ओर ले जाती है। जीवन तभी महत्वपूर्ण बनेगा, जब जीने का तरीका महत्वपूर्ण होगा। जिसका वर्तमान अच्छा होता है, उसका भविष्य भी अच्छा ही होगा, विशेषकर धर्मनिष्ठ लोगों के मामले में। हमारी संस्कृति में विवाह सात जन्मों का रिश्ता माना गया है। हम विवाह को सौदा नही, संस्कार की श्रेणी में रखते हैं। रूक्मणी विवाह मातृ शक्ति के मंगल का प्रतीक है।
मनोरमागंज स्थित गीता भवन पर वृंदावन के प्रख्यात भागवताचार्य महामंडलेश्वर स्वामी प्रणवानंद सरस्वती ने भागवत ज्ञानयज्ञ में रूक्मणी विवाह प्रसंग के दौरान उक्त दिव्य विचार व्यक्त किए। आज शाम कृष्ण-रूक्मणी विवाह का उत्सव धूमधाम से मनाया गया। बारात भी निकली और फूलों की वर्षा के बीच स्वागत सत्कार भी हुआ। वर-वधू ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई तो समूचा सभागृह भगवान के जयघोष से गूंज उठा। प्रारंभ में बजरंग खंडेलवाल, राजेंद्र जोशी, मनोज गुप्ता, रश्मि रामनानी, अविनाश गुप्ता आदि ने आचार्यश्री की अगवानी की। व्यासपीठ का पूजन गीता भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष गोपालदास मित्तल, राम ऐरन, रामविलास राठी एवं बजरंग खंडेलवाल ने किया। संयोजक प्रदीप अग्रवाल एवं सुनील तिवारी ने बताया कि गीता भवन भक्त मंडल एवं अखंड प्रणव येग वेदांत पारमार्थिक न्यास के तत्वावधान में कथा का समापन 16 जुलाई गुरूपूर्णिमा को सुबह 11 से 1 बजे तक गुरूपाद पूजन के साथ होगा। सुबह 7 से 9 बजे तक यज्ञ-हवन भी होगा।
 महामंडलेश्वरजी ने कहा कि भगवान को धर्म की हानि बर्दाश्त नहीं होती। जब-जब पृथ्वी पर अन्याय, दुराचार और अनीति का प्रभुत्व बढ़ता है, भगवान को सज्जनों की रक्षा के लिए आ कर अपनी लीलाएं करना पड़ती हैं। भक्तों में ही वह शक्ति है जो भगवान को अपने पास बुला सकती है। विवाह की जो आदर्श व्यवस्था भारतीय समाज में है, वैसी दुनिया के किसी देश में नहीं है। यही कारण है कि विदेशी जोड़े भी भारत आकर विवाह रचाने के लालायित देखे जाते हैं।