इन्दौर । हम जीवन के पहले दिन से मृत्यु तक सोलह संस्कारों में जीते हैं, और इन्हीं संस्कारों में से एक है-विवाह। विवाह भारतीय संस्कृति का श्रेष्ठतम अलंकरण है। भारत भूमि सामाजिक मर्यादाओं के दायरे में रहकर ही फल-फूल रही है। भगवान कृष्ण और रूक्मणि का विवाह नारी शक्ति के प्रति मंगल भाव का सूचक है। विवाह एक अटूट बंधन है जो दो परिवारों के साथ ही मर्यादा एवं धर्म-संस्कृति के पोषण का प्रतीक है। पश्चिम और पूरब की संस्कृति में यही अंतर है कि हमारे यहां विवाह सात जन्मों के लिए होता है, वहां सात दिनों की भी कोई गारंटी नहीं होती।  
हरिद्वार के भागवताचार्य पं. कृष्ण देव शास्त्री ने आज बालाजी सेवा संस्थान ट्रस्ट एवं जागृति महिला मंडल के तत्वावधान में बिचैली मर्दाना रोड, स्कीम 140 स्थित श्री वैष्णव धाम परिसर में झालरिया पीठाधीश्वर जगदगुरू रामानुजाचार्य स्वामी घनश्यामाचार्य महाराज की प्रेरणा से चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ में कंस वध एवं रूक्मणी विवाह प्रसंगों की व्याख्या करते हुए उक्त प्रेरक विचार व्यक्त किए। कथा में कृष्ण-रूक्मणी विवाह का जीवंत उत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। बधाई गीत भी गूंजे और वर-वधू को उपहार भी किए गए। जैसे ही कृष्ण-रूक्मणी ने एक-दूसरे को वरमाला पहनाई, कथा स्थल जयघोष से गूंज उठा। विवाह के लिए कथा स्थल को विशेष रूप से श्रृंगारित किया गया था। प्रारंभ में पूर्व मंत्री रामेश्वर पटेल, आयोजन समिति की ओर से बालाजी सेवा संस्थान ट्रस्ट के प्रबंध न्यासी डॉ. आर.के. गौड़, संयोजक श्यामबाबू बंसल, गिरीश लवलेकर, श्रीमती अनिता गौड़, आशुतोष शर्मा, कीर्ति शर्मा, दीप्ति शर्मा, विवेक गौड़, राघव गौड़ आदि ने आचार्य पं. रामशंकर पाराशर द्वारा वैदिक मंत्रोच्चार के बीच व्यासपीठ का पूजन किया। संध्या को आरती में श्रीमती विनोद अहूलवालिया, रचना बोहरे, मनोज जोशी, डॉ. आर.सी. शर्मा, श्यामसुंदर एवं बालकृष्ण सहित सैकड़ों भक्तों ने भाग लिया। संचालन डॉ. विजय कुमार सालवी ने किया। संयोजक डॉ. गौड़ ने बताया कि कथा का समापन रविवार 11 अगस्त को दोपहर 2.30 से सांय 6.30 बजे तक सुदामा चरित्र एवं परीक्षित मोक्ष कथा के साथ होगा। यज्ञ-हवन के साथ पूर्णाहुति होगी। समापन अवसर पर उज्जैन के संत स्वामी असंगानंद, नोएडा फिल्म सिटी के चेयरमैन संदीप मारवाह, राजेश लांबा सहित अनेक विशिष्टजन भी उपस्थित रहेंगे।
आचार्य पं. शास्त्री ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी लीलाओं से अनेक ऐसे संदेश दिए हैं, जो हर युग में प्रासंगिक हैं। पश्चिम की संस्कृति में विवाह सात दिन और सात माह के लिए होता है लेकिन भारतीय समाज सात जन्मों के परिणय को बंधन को निभाता है, यही हमारे परिवारों और समाज की नैतिक ऊंचाईयों का प्रमाण है। रूक्मणि विवाह नारी के प्रति भगवान के मंगलभाव एवं उद्धार का संदेश देने वाला प्रसंग है। विवाह भारतीय संस्कृति का सबसे उजला पक्ष है।