अति हमेशा नुकसान दायक है। यह नियम अच्छी और बुरी दोनों आदतों पर लागू होता है। ऋषि-मुनियों ने अति को वर्जित ही बताया है। बुद्ध ने एक शब्द दिया था मंझम मग्न यानी मध्यम मार्ग। जीवन का यह संतुलन उन्हें एक दिन वह सब दिला गया जिसके लिए उनकी पूरी तपस्या थी। अपनी बोध प्राप्त की अवस्था में उनसे एक प्रश्न पूछा गया था जिसका उन्होंने बड़ा सुंदर उत्तर दिया था। किसी का प्रश्र था उनसे अब आपको क्या मिला? क्या वह प्राप्त हो गया जिसके लिए आपके सारे प्रयास थे? बुद्ध ने कहा- नया कुछ नहीं मिला, जो कुछ मेरे पास पहले से था, पाया ही हुआ था, पूर्व उपलब्ध था, उसका ज्ञान हो गया, पता चल गया उसका। वह दौलत अपने ही भीतर थी हम बाहर ढूंढ रहे थे। 
जिसके कारण बाहर निकला, वो तो मेरे भीतर निकला। हम दो भूलें कर जाते हैं या तो बिल्कुल बाहर संसार पर टिक जाते हैं या एकदम भीतर उतर जाते हैं। ये अतियां हमारे लिए हमारे अध्यात्म की दुश्मन बन जाती हैं। आचार्य श्रीराम शर्मा संसार में संतुलन से चलने के लिए एक अच्छा उदाहरण बताया करते थे। दुनिया में ऐसे चलो जैसे पानी में हाथी चलता है। हाथी जानता है पानी में जल्दबाजी करूंगा तो कीचड़ या गड्ढे में गिर सकता हूं। लिहाजा आगे और पीछे के पैर रखने में वह गजब का संतुलन बनाता है। बस, ऐसा ही संतुलन हमें बाहर और भीतर की यात्रा में रखना होगा। जैसे ही हम संतुलन में आते हैं हमारी अंतर दृष्टि स्पष्ट हो जाती है और हम स्वयं को पहचान जाते हैं। स्वयं को जानते ही परमात्मा दिख जाता है। भगवान होना नहीं पड़ता, बस यह समझना पड़ता है कि हम हैं ही भगवान। जरा सा स्वयं का पता लगा और दुनिया बदली। इसीलिए संतुलन जरूरी है संयम की अति से।