आजकल महंगाई के कारण एक बच्चे का चलन है। इससे लाभ के साथ ही कुछ नुकसान भी हैं। ऐसे में बच्चे को अधिक प्यार मिलता है पर हद से ज्यादा लाड़-प्यार और ध्यान देने के साथ पले इकलौते बच्चों में कई तरह की समस्याएं भी जन्म लेने लगती हैं। एक ही बच्चा है, यह सोच कर अभिभावक उसकी हर मांग पूरी करते हैं, परंतु यह बात बच्चे के पूरे व्यक्तित्व को भी प्रभावित करने लगती है। यदि हम अपने सामाजिक परिवेश और बदलते पारिवारिक रिश्तों पर नजर डालें तो परिवार में एक ही बच्चे का फैसला समझौता ही लगता है, क्योंकि आज की आपाधापी भरी जिंदगी में ज्यादातर कामकाजी दंपत्ति एक ही बच्चा चाहते हैं। न संयुक्त परिवार और न ही भाई-बहन का साथ, ऐसे में बच्चे के अकेलेपन का यह भावनात्मक पहलू उस के पूरे जीवन को प्रभावित करता है।
खत्म होते रिश्ते
यदि किसी परिवार में इकलौता बेटा या बेटी है तो उस की आने वाली पीढिय़ां चाचा, ताऊ, बुआ, मौसी एवं मामा के रिश्ते से हमेशा के लिए अनजान रहेंगी। पारिवारिक माहौल के बिना बच्चे जीवन के उतार-चढ़ाव को नहीं समझ पाते और बड़े होने पर अपने ही अस्तित्व से लड़ाई लड़ते हैं। घर में खुशियां बांटने और मन की कहने के लिए हमउम्र भाई-बहन का न होना बच्चों को अखरता है । 
शेयरिंग की आदत न रहना
परिवार में एक बच्चा अपना अधिकतर समय अकेले ही बिताता है। ऐसे माहौल में पले-बढ़े बच्चों में एडजस्टमैंट और शेयरिंग की सोच को पनपने का मौका ही नहीं मिलता। छोटी-छोटी बातों पर उन्हें गुस्सा आ जाता है, अपनी हर चीज को लेकर वे पजैसिव रहते हैं कि न तो किसी के साथ रह सकते हैं और न ही किसी दूसरे की मौजूदगी को सहन कर सकते हैं । ऐसे बच्चे अक्सर जिद्दी और शरारती बन जाते हैं। 
गैजेट्स की लत
अभिभावक अपने इकलौते बच्चों को आधुनिक तकनीक से अपडेट रखने की हर संभव कोशिश करते नजर आते हैं। कामकाजी अभिभावकों को ये गैजेट्स बच्चों को व्यस्त रखने का आसान माध्यम लगते हैं। यही वजह है कि अकेले बच्चों की जिंदगी में हमउम्र साथियों और किस्से-कहानी सुनाने वाले बुजुर्गों की जगह टी.वी., मोबाइल और लैपटॉप जैसे गैजेट्स ने ले ली है । 
साथ रहने और खेलने को न किसी बड़े का मार्गदर्शन और न ही छोटे का साथ, नतीजतन बच्चे इन गैजेट्स का इस्तेमाल बेरोक-टोक मन मुताबिक ढंग से करते हैं। धीरे-धीरे ये गैजेट्स उनकी लत बन जाते हैं तथा ऐसे बच्चे लोगों से घुलने-मिलने से कतराने लगते हैं । इंटरनैट पर बहुत ज्यादा समय बिताने वाले बच्चों में सामाजिकता खत्म हो जाती है, जिस से उन के शारीरिक और मानसिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है । 
आत्म केंद्रित हो जाते हैं
इकलौते बच्चे का व्यवहार और कार्यशैली उन बच्चों से बिल्कुल अलग होती है जो अपने हमउम्र साथियों या भाई बहनों के साथ बड़े होते हैं । वर्किंग पेरैंट्स के व्यस्त रहने के कारण ऐसे बच्चे उपेक्षित और कुंठित महसूस करते हैं । कम उम्र में सारी सुख-सुविधाएं मिल जाने के कारण ये जीवन की वास्तविकता और जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं समझ पाते तथा ऐसे बच्चे आमतौर पर आत्म केंद्रित हो जाते हैं । 
सामाजिक नहीं होते 
अकेले पले-बढ़े बच्चे सामाजिक नहीं होते और उन्हें हर समय दूसरों की अटैंशन एवं डिपैंडैंस की तलाश रहती है । संपन्न परवरिश मिलने के कारण ये इकलौते बच्चे जिंदगी की हकीकत से दूर ही रहते हैं। लाड़-प्यार और सुख-सुविधाओं में पलने के कारण ये बच्चे आलसी और गैर-जिम्मेदार बन जाते हैं जिससे छोटे-छोटे कामों के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहने की आदत हो जाती है क्योंकि माता-पिता उनके सारे काम करते हैं जिससे आत्मनिर्भरता की कमी के चलते उन के व्यक्तित्व में आत्मविश्वास की भी कमी आ जाती है। खान-पान की आदतें भी बिगड़ जाती हैं, जिससे मोटापे जैसी शारीरिक व्याधियां भी घर कर जाती हैं ।