भोपाल।  आत्म शुद्धि के 10 दिवसीय पर्यूषण पर्व का समापन ब्रह्मचर्य धर्म की आराधना के साथ हुआ। राजधानी के जैन धर्मावलंबियों द्वारा अनंत चतुर्दशी के पावन अवसर पर निर्जल उपवास रखे गये। तीर्थंकर वासुपूज्य भगवान का मोक्ष कल्याणक भी श्रद्धा, भक्ति से मनाया गया। मंदिरों में वासुपूज्य भगवान के अभिषेक के साथ संपूर्ण जगत में शांति की कामना को लेकर शांतिधारा की गई और निर्वाण लाडू समर्पित किये गये। चौक जैन मंदिर से मुनिश्री प्रसाद सागर महाराज, मुनिश्री शैल सागर महाराज, मुनिश्री निकलंक सागर महाराज के सानिध्य में भगवान जिनेन्द्र की विशाल शोभायात्रा निकली शोभायात्रा में सबसे आगे 51 धर्म ध्वजायें फहराती हुई विश्व शांति और बंधुत्व का संदेश दे रही थी। 21 पंजाबी ढोल की थाप पर युवा वर्ग जयकारे लगाते हुये थिरक रहे थे। 11 अश्वों पर पाठशाला के बच्चे धर्म ध्वजा थामे बैठै थे। शहनाई, बैण्ड बाजा आदि के साथ महिलायें, युवतियां भक्ति नृत्य के साथ भक्ति कर श्रद्धा का इजहार कर रही थी।  जैनम दिव्यघोष के युवक एवं युवतियां वाद्य यंत्रों की संगीतमय स्वर लहरियों के साथ आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के गुणों की वंदना कर रही थीं। दिगम्बर जैन पंचायत कमेटी ट्रस्ट के मीडिया प्रभारी अंशुल जैन ने बताया चारो ओर उत्साह का और भक्ति के महौल में भगवान जिनेन्द्र की 3 चांदी की पालकियां श्रद्धा, भक्ति का प्रमुख केन्द्र थी। 
मुनिश्री प्रसाद सागर महाराज ने आशीष वचन में कहा आत्मा में रमण करना ही ब्रह्मचर्य है। आत्मा ब्रह्मस्वरूप है। इस रमण करें, उत्तम ब्रह्मचर्य हमारी आत्मा का श्रृंगार है और जो अपनी आत्मा से राग करता है वह इस धर्म के निकट रहता है। अपने मन की निर्मला से ही उत्तम ब्रह्मचर्यपन है। पर आज मन को विकृत करने वाले साधन तो हमारे पास बहुत है और निर्मल करने वाले कम। आज कुछ मानसिक विकृति वाले व्यक्तियों के कारण  घटनाओं से हमारे देश को शर्मसार होना पड़ा है। प्रभु से प्रार्थना करें कि ऐसे व्यक्ति को सद्बुद्धि दे। जीवन में धन नष्ट हो जाये तो कोई बात नहीं और स्वास्थ्य जाये तो कुछ नुकसान है पर चारित्र चला जाये तो सबकुछ नष्ट हो जाता है।