तनाव हमारी सदी का सबसे बड़ा अभिशाप हैं .इससे सब परिचित हैं और करीब करीब सब इसके शिकण्जे में हैं. यह संस्कृति की "तन " धातु की संतान हैं .इससे कई शब्द बने हैं ,जिनमे से" तान "और तनाव ध्यान देने योग्य हैं .
ग़लतफ़हमी तनाव की माँ हैं और असंतोष इसका पिता ; आशंका कारण और विक्षोभ और असंतोष परिणाम हैं .
तनाव  – भय, चिन्ता, दबाव अथवा कार्य को शीघ्रता से पूर्ण करने की बाध्यता/इच्छाजनित एक विशिष्ट शारीरिक मानसिक स्थिति है, जिसमें रक्त परिवहन गति असामान्य हो जाती है तथा व्यक्ति में चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, सिरदर्द, अवसाद, एकाग्रता की कमी आदि लक्षण दृष्टि गोचर होते हैं।
आधुनिक जीवन शैली तनावों को बढ़ाती है। अध्ययन, व्यवसाय व नौकरी की प्रतिर्स्पद्धा, अन्य से आगे बढ़ने की इच्छा व सफलता की भूख, असफलता का भय तनावों को बढ़ा देता है। आधुनिक भौतिकवादी विचार धारा व भोजनपान की आदतें शरीर व मन की तनाव को सहन करने की क्षमता को कम करती हैं। विलासिता पूर्ण या आरामप्रद भौतिक सुविधाएं भी क्षमता को कम करती हैं।
आज किशोरावस्था के बच्चों में भी बढ़ता हुआ तनाव उनमें पैदा होने वाले उच्च रक्तचाप व मधुमेह जैसी बीमारियों का कारण है।
तनाव आज के जीवन का अनिवार्य अंग बन गया है, उसको सहन करने के लिये शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक स्तर पर स्वस्थ व सक्षम होना आवश्यक है। सफल व्यक्ति जीवन के तनावों का सफलता पूर्वक सामना करते हुये लगातार परिश्रम करते हुये सफलता के उच्चस्तर को अर्जित करते हैं तथा तनावों के बीच भी सदैव प्रसन्न रहते हैं।
तनाव के प्रमुख कारण
भय, मनमुटाव, संघर्ष की आशंका, शारीरिक रूग्णता, अनिष्ट न घट जाये इस का भय, कार्याधिक्य, इच्छा के विपरीत कार्य करने की बाध्यता, पारिवारिक असंतुलन, आजीविका की अनिश्चितता, परीक्षाओं का तनाव असफलता या सफलता के निम्नस्तर की आशंका, इच्छित केरियर, पाठ्यक्रम, कोर्स में प्रवेश में असफलता एवं ऐसे ही अनेक कारण।
तनाव से मुक्ति के उपाय
आधुनिक कठोर व प्रतिस्पर्धापूर्ण जीवनशैली पूर्ण शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य व वैचारिक क्षमता की मांग करती है। पहले शारीरिक स्वास्थ्य के सम्बन्ध में चर्चा करते है।
शारीरिक स्वास्थ्य व तनाव से मुक्ति
सभी जानते हैं शारीरिक स्वास्थ्य का व्यक्ति की कार्य क्षमता से सीधा सम्बन्ध है तथा स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। अत: यह आवश्यक है कि आज के तनाव पूर्ण जीवन में सफल होने के लिये अच्छा शारीरिक स्वास्थ्य अर्जित किया जाय।
तनाव का सामना करने के लिये शरीर में लोच या लचीलापन होना अत्यावश्यक है। इसके लिये पौष्टिक व हितकर भोजन तो आवश्यक है ही, साथ ही उचित व्यायाम भी इसकी एक अनिवार्य आवश्यकता है। व्यायाम शरीर की मांसपेशियों व नाड़ियों, रक्त वह शिराओं को मजबूत व लचीला बनाता है।
 जितने भी सफल व्यक्ति हैं उनमें से अधिकांश स्वस्थ रहने के लिये नियमित रूप से व्यायाम एवं योग को अपनाते हैं। बड़े-बड़े व्यावसायिक उपक्रमों में आजकल कार्य क्षमता को बढ़ाने के लिये बीच-बीच मे योग की कक्षाएं, कार्य शालाएं आयोजित की जाती हैं। व्यायाम अथवा योग शरीर की गन्दगी को निकालने में शरीर की सहायता करते हैं तथा पोषण भी प्रदान करते हैं। व्यायाम अथवा योग से शरीर में पाचन क्रिया तीव्र होती है। रक्त परिवहन की गति बढ़ जाती है, तेज व गहरे श्वास लेने से अधिक आक्सीजन शरीर को मिलती है जो एक ओर तो शरीर की अशुद्धियों को जला देती है दूसरी ओर भोजन को पचाकर शरीर को पोषण प्रदान करती है। रक्त का तीव्र प्रवाह शारीरिक उर्जा के स्तर को बढ़ा देता है। फलत: व्यायाम करने वाले व्यक्ति अधिक समय तक आत्म विश्वास से पूर्ण एवं युवा अनुभव करते हैं, उनमें बुढ़ापे के लक्षण विलम्ब से प्रकट होते हैं।
   विभिन्न उपयोगी व्यायाम
१. सूर्य नमस्कार :- किशोरों व युवाओं के लिये सर्व श्रेष्ठ इसमें दस आसन हैं जो शरीर के सभी अंगो व अन्त:स्त्रावी ग्रंथियों को सक्रिय करते हैं उन्हें सबल व लोचपूर्ण बनाते हैं।
२. प्रात: तीव्र गति से भ्रमण :- इसके लाभों से सभी परिचित है। सभी प्रौढ़ व वृद्ध लोगों के लिये उत्तम/उच्च रक्तचाप व मधुमेह को दूर करने में एक घण्टे का प्रात: भ्रमण सक्षम है।
३. प्राणायाम :- सामान्य गहरे श्वास लेना, कुछ क्षण रोककर धीरे धीरे निकालना। जब चाहे तब कर सकते हैं। प्रात: स्नान के बाद दोनों समय भोजन के बाद व थकान की अवस्था में, चित्त के चंचल होने, एकाग्रता न होने की दशा में भी लाभप्रद। मस्तिष्क की क्षमता व एकाग्रता को बढ़ाने के लिये लाभकारी।
हमारे द्वारा ली गई आक्सीजन का २० प्रतिशत मस्तिष्क के द्वारा ग्रहण किया जाता है। अत: गहरे श्वास लेने से मस्तिष्क को सीधा लाभ होता है, उसे अधिक आक्सीजन मिलती है जो उसकी कार्य क्षमता-सक्रियता को बढ़ा देती है।
४. यौगिक क्रियाएं :- इसका आजकल बहुत जोर है। किसी जानकार व्यक्ति से इन्हें सीखकर लाभ उठाया जा सकता है। सर्वांगासन, अर्धचक्रासन, उत्तानपादासन, ताड़ासन व भुजंगासन सारे शरीर को लाभ पहुचाने वाले आसन हैं।
५. पी. टी. व खेल :- ये शरीर को स्वस्थ व सबल तो बनाबनाते ही हैं मनोरंजक होने से मानसिक स्वास्थ्य में भी वृद्धि करते हैं। खेल व्यक्ति में संगठन, सहयोग व समन्वय, सामाजिकता व सुरक्षा की भावना में वृद्धि करते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य व तनाव से मुक्ति
यह सर्व विदित है कि उच्च बौद्धिक क्षमता व मानसिक स्थिरता युक्त व्यक्ति दैनिक जीवन के तनावों का कुशलता पूर्वक सामना करने में सफल होते हैं। ऐसे ही व्यक्ति बाधाओं को दूर करने में, असफलताओं के बीच से सफलता का मार्ग खोजने में सफल होते हैं। ये वे लोग होते है जो असफलताओं से घबराते नहीं है तथा अपनी कमियों को दूर कर आत्म विकास करते हुये सफलता का वरण करते हैं।
 यह भी सफल व्यक्तियों के जीवन व कार्यप्रणाली का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोगों का जीवन के प्रति एक विशिष्ट व सकारात्मक दृष्टिकोण होता है तथा ये सैद्धान्तिक तौर पर दृढ़ परन्तु व्यवहार में लचीलापन लिये हुये अपने सहयोगियों को साथ लेकर चलने में व उन्हे इच्छित लक्ष्यों को प्राप्त करने हेतु प्रेरित करने में सक्षम होते हैं। उनका व्यक्ति की अच्छाइयों में विश्वास होता है। ये अल्पकालिक अथवा क्षणिक भावनाओं के वशीभूत नहीं होते, वरन अपनी भावनाओं पर बुद्धि का नियन्त्रण रखने वाले होते हैं।
तनाव मुक्ति में जैन सिद्धान्तो का योगदान
जैन दर्शन के सिद्धान्त जहां वस्तु स्वरूप की अनन्त गुण सम्पन्नता व स्वतन्त्रता की घोषणा करते हैं वहीं अहिंसा, अनेकान्त व अपरिग्रह समाज में सह अस्तित्व, सहानुभूति, सहयोग व मतान्तरों के प्रति भी सम्मान का भाव सुनिश्चित करते हैं। जहां आत्मा की अजरता अमरता का सिद्धान्त व्यक्ति को स्वयं के अनिष्ट की आशंका से मुक्त कर देता है वहीं यह दूसरों का भला या बुरा करने के अहंकार से व्यक्ति को विरक्त भी करता है।
आत्मा की अमरता का सिद्धान्त
उच्च पदो पर कार्य करते हुये तथा सांसारिक जीवन में कई बार अनावश्यक दबावों व धमकियों का सामना करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में आत्मा की अमरता व अजरता का विश्वास व्यक्ति को अप्रतिम दृढ़ता प्रदान करता है जिसके कारण व्यक्ति सिद्धान्तों से समझौता नहीं करता वरन् अपने आदर्श मार्ग पर दृढ़ रहता है। वह जानता है कि जीवन में समस्त ही अनुकूल व प्रतिकूल संयोग व आयुष्य पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों के उदयानुसार ही होते हैं अन्य कोई किसी का भला बुरा करने की सामर्थ्य नहीं रखता।
कर्म व कर्म फल का सिद्धान्त
जैन दर्शन के अनुसार यह सृष्टि अनादि अनन्त है इसका कोई निर्माता या नियन्ता नहीं है। सभी संसारी जीव अपने कर्मो का फल समय आने पर अनुकूल या प्रतिकूल भोगते हैं। इस सिद्धान्त के अनुसार व्यक्ति अपने कर्मो के लिये स्वयं उत्तरदायी होता है, वह जानता है कि वह अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ भावों का फल खुद ही भोगने वाला है। पाप के फल में उसे कोई शरण देने वाला नहीं हैं अत: वह अशुभ कर्मों से यथाशक्ति बचने का प्रयत्न करता है तथा प्रतिकूलताओं में स्वयं कृत कर्मो का ही प्रतिफल जानकर शान्ताचित्त ही रहता है।
अनेकान्त व स्याद्वाद का सिद्धान्त व्यक्ति को अन्य लोगों के मन्तव्य को समझने व अपनी बात को स्पष्टता से समझाने में मदद करता है।
जैन साधना के सूत्र व तनाव मुक्ति
जैन दर्शन में चित्त की निर्मलता व एकाग्रता को बढ़ाने के लिये अनेक उपायों की चर्चा की गई है जो न केवल कषायों में कमी लाते हैं वरन् वे चित्त की एकाग्रता व तत्वज्ञान में वृद्धि करके तनाव मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इनमें सस्वर पूजन-पाठ-भक्ति-स्वाध्याय-मंत्रजाप व सामायिक आदि कार्य प्रमुख हैं।
वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात सिद्ध हो चुकी है कि प्रात: नित्य कर्म से निवृत्त होकर किये जाने वाले सस्वर देव पूजन-भक्ति, स्तुति पाठ शरीर में कोलेस्ट्रोल व हानिकारक द्रव्यों की मात्रा में कमी करते हैं। इन क्रियाओं के माध्यम से शरीर में कषायों को बढ़ाने वाले हानिकारक हारमोन्स का स्राव बन्द हो जाता है तथा फेफड़े, हृदय व पाचन तंत्र की क्रियाशीलता में वृद्धि होकर हानिकारक विजातीय तत्वों को शरीर से बाहर निकलने में मदद मिलती है। सस्वर वाचन से तंत्रिका तंत्र व रक्तवह नाड़ियों का लचीलापन बढ़ता है जो शरीर की तनाव सहन करने की क्षमता को बढ़ाता है।
इसके साथ ही ध्यान या सामायिक का तनाव घटाने में महत्वपूर्ण योगदान हैं। ध्यान के लाभों से समस्त ही विश्व आज सुपरिचित है। जैन दर्शन में कहा गया सामायिक ध्यान का ही एक रूप है जिसमें वस्तु स्वरूप का चिन्तन करते हुये बाह्य जगत के विषयों से मन को हटाकर उसे आत्म स्वरूप में एकाग्र करने का अभ्यास किया जाता है। इस क्रिया में चित्त की चंचलता व शरीर की अनेकानेक क्रियाओं में मन्दता आ जाती है, शरीर पूर्णत: शिथिल हो जाता है किन्तु ज्ञान पूर्णत: जाग्रत रहता है। इस ध्यान या सामायिक का प्रभाव शरीर व मन के तनावों को घटाने की दृष्टि से अद्वितीय है, उत्कृष्ट ध्यान को मुक्ति का कारण कहा गया है।
इसी प्रकार स्वाध्याय भी तनाव को घटाने का एक महत्वपूर्ण साधन है।
तीव्र कषायी व्यक्ति भी यदि स्वाध्याय करता या सुनता है तो उसकी कषाय में शनै: शनै: तत्वज्ञान-वस्तु स्वरूप के यथार्थ ज्ञान की प्राप्ति होने से कमी आने लगती है। वास्तविक वस्तु स्वरूप का ज्ञान होने से व्यक्ति किसी भी परिस्थिति में तनाव ग्रस्त नहीं होता तथा प्रतिकूलताओं में भी वह समाधान का मार्ग निकाल ही लेता है। कहा भी गया है कि ‘स्वाध्याय: परमं तप:` तथा ज्ञान ही सर्व समाधान कारक है। इस प्रकार स्वाध्याय से अर्जित ज्ञान तनाव मुक्ति के लिये उत्कृष्ट समाधान प्रस्तुत करता है तथा तनाव रहित जीवन की कला सिखाता है।
सकारात्मक चिन्तन
जैन दर्शन में ऐसा कहा गया है कि जैसी दृष्टि होती है वैसी ही सृष्टि होती है अर्थात हम जैसा सोचते हैं वैसा ही वस्तु या व्यक्ति का व्यवहार होता है। यदि हम किसी व्यक्ति के बारे मे अच्छा विचार करते हैं तो वह भी हमारे सम्बन्ध में अच्छा विचार ही रखता है अथवा कालान्तर में रखने लगेगा। यदि हम किसी का बुरा सोचते है तो वह भी हमारे बारे में बुरा ही सोचता है। आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी यह बात सिद्ध हो चुकी है कि एक व्यक्ति की मानसिक विचार तरंगें दूसरे सम्बन्धित व्यक्ति की भावनाओं को प्रभावित करती है।
वर्तमान में प्रतिकूलता हो तो भी भविष्य के प्रति आशावादी रहते हुये अभीष्ट कार्य हेतु सतत् प्रयत्नशील रहना चाहिये।
और अन्त में सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु है प्रमाद रहित जीवन, स्वयं को व्यस्त रखना अथवा समय का सदुपयोग। जैन शास्त्रों के अनुसार मानव जीवन बहुमूल्य है इसका प्रत्येक समय काम में लिया जाना चाहिये। चारों गतियों व चौरासी लाख योनियों में यह सर्वश्रेष्ठ है। मुक्ति की पूर्ण साधना मनुष्य जीवन में ही संभव है, मुक्ति ही तनाव रहित सर्वोच्च अवस्था है।
लौकिक दृष्टि से देखें तो व्यस्त व्यक्ति कम तनाव ग्रस्त रहते हैं। वे स्वयं को किसी न किसी रचनात्मक कार्य में लगाये रखते हैं जिससे उन्हें कार्योपरान्त सन्तुष्टि का अनुभव होता है।
समय के प्रत्येक क्षण का अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिये उपयोग करने से सफलता सुनिश्चित होती है और पश्चाताप का अथवा तनाव का अवसर ही उत्पन्न नहीं होता। जो लोग समय का उपयोग नहीं करते, उचित समय पर उचित कार्य नहीं करते व अभीष्ट उपलब्धि अर्जित करने में असफल रहते हैं, बाद में उनका मन अनेक संकल्प विकल्पों से भर जाता है। कहा भी गया है कि जो समय को नष्ट करता है, समय उसे नष्ट कर देता है अर्थात समय को नष्ट करने वाला व्यक्ति असफल असंतुष्ट जीवन जीते हुये दुर्गति का पात्र बनता है।
अत: समय का सदुपयोग नियमितता व समय पालन आदि गुण न केवल सफलता की गारन्टी देते हैं वरन् तनाव से भी बचाते हैं।
१. भक्ति व ध्यान तनाव घटाते हैं।
२. जीव की शक्ति या तो ज्ञान में लगती है या राग में। ज्ञान में प्रयत्न पूर्वक लगाना पड़ता है लेकिन राग में अनादि संस्कार के कारण शक्ति स्वत: ही लगती है।
    ‘साइंस` पत्रिका में प्रकाशित एक शोध पत्र में डा. मोर्गन कहते हैं कि ओम के उच्चारण से पेट, सीने और मस्तिष्क में पैदा हुये कम्पन से शरीर की मृत कोशिकाओं को नया जीवन मिलता है और नई कोशिकाओं का निर्माण होता है। उल्लेखनीय है कि इस जाप से सारे शरीर में संतुलित तरंगो का प्रवाह होने से यह कमाल होता है।
ओम का उच्चारण अलग-अलग आवृतियों में करने से अनेक असाध्य रोग ठीक हो जाते हैं। साइन्स पत्रिका में प्रकाशित शोध के अनुसार ओम के लगातार जाप से चमत्कारिक प्रभाव होता है यह बन्ध्यत्व में भी लाभ पहुंचाता है तथा सेरीब्रल पाल्सी जैसे असाध्य रोग में भी इसके सकारात्मक प्रभाव देखने मे आये हैं।
 विविध मनोदैहिक व्याधियों के उपचार में औंकार मन्त्र की सफलता असंदिग्ध है। असाध्य मानसिक रोगों में भी इस मन्त्र से चमत्कार पूर्ण लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। तनाव अवसाद जैसे मनोरोगों से पीड़ित इन्सान के लिये यह मंत्र किसी अमोध औषधि से कम नहीं है। यह न केवल मानसिक शक्ति व शान्ति प्रदान करता है बल्कि इससे स्नायुओं की चंचलता दूर होकर विविध हृदय रोगों, उच्च व निम्न रक्त चाप, मधुमेह जैसे कष्ट साध्य रोगों का उपचार किया जाना संभव हुआ है। औंकार मन्त्र के नियमित जाप से हृदय की शुद्धि होती है मानसिक शक्ति प्रखर होती है।
तनाव ,भय ,डर ये खोखला करते हैं मानव को 
तन मन जन में होता हैं टकराव 
स्वयं लड़ो और स्वयं हारो इससे 
बस इसका जीतना होता हैं शांतता से  
संसार की असारता को समझो  
वक़्त का तकाज़ा होता हैं 
कौन यहाँ स्थायी हैं 
पलायन नहीं , सामना करो 
तनाव रहित रहो।