भारत रत्न और देश के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की आज 74वीं जयंती है. राजीव गांधी के देश के प्रधानमंत्री रहते हुए कई ऐसी ऐतिहासिक घटनाएं हुईं थी जिसकी वजह से राजीव गांधी को कभी भुलाया नहीं जा सकता. मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के पास भी राजीव गांधी को याद रखने की कुछ वजहें हैं.

उसी में से एक वजह है जिसने भोपाल वासियों को ऐसा गम दिया था जो भुलाया ना जा सके और ऊपर से सरकार द्वारा उनके दुख के दोषी को फरार होने में मदद देना तो आज भी यहां के लोगों में आक्रोश पैदा कर देता है.

3 दिसंबर 1984 को भोपाल में यूनियन कार्बाइड की कंपनी से जानलेवा गैस थाइलआइसोसाइनाइट लीक होने की वजह से हजारों की संख्या में लोगों की मौत हुई थी और जो बच गए थे उनमें से हजारों आज भी इस गैस से हुए शारिरिक नुकसान की पीड़ा उठा रहे हैं.

दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदी के बारे में कहा जाता है कि यूनियन कार्बाइड के मालिक वॉरेन एंडरसन को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उनकी सरकार ने खुद भागने में मदद की. यहां तक कि बिना किसी कार्रवाई के एंडरसन को सरकारी प्लेन द्वारा कड़ी सुरक्षा के बीच भोपाल से दिल्ली पहुंचाया गया था, जिसके बाद वो अमेरिका वापस चला गया.

बीजेपी के नेता बार बार मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत अर्जुन सिंह की किताब के हवाले से आरोप लगाते रहे हैं कि राजीव गांधी के मौखिक आदेश पर गैस कांड के मुख्य आरोपी वॉरेन एंडरसन को छोड़ा गया. भोपाल गैस त्रासदी विश्व की भीषणतम औद्योगिक त्रासदी मानी जाती है. एंडरसन को यूं वापस जाने देने की टीस हर भोपालवासियों के मन में है. उनकी कई पीढ़ियों को बर्बादी झेलनी पड़ी, लेकिन इसके लिए जिम्मेदार एंडरसन को सरकार ने भोपाल से सुरक्षित जाने दिया. इसके लिए भोपाल की जनता सीधे तौर पर राजीव गांधी को जिम्मेदार मानती रही है.

इसके अलाव 1991 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी को भोपाल में मिली करारी हार को भी यहां के लोग कभी नहीं भूल पाएंगे. 1991 के लोकसभा चुनाव में तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष राजीव गांधी ने स्वर्गीय नवाब मंसूर अली खां पटौदी को भोपाल सीट से चुनाव लड़वाया था. उन्होंने खुद यहां आकर पटौदी के लिए धुआंधार चुनाव प्रचार किया था. तमाम क्रिकेटर्स और फिल्म स्टार को भी प्रचार में भेजने के बावजूद राजीव गांधी नवाब पटौदी को चुनाव में जीत नहीं दिलवा सके थे.

ऐसा माना जाता है कि उस समय राजीव का जादू बाकी जगह भले ही कायम था, लेकिन गैस त्रासदी और एंडरसन को भगाने में मदद करने के कारण भोपालवासियों में राजीव के प्रति लगाव खत्म हो चुका था, जो 1991 में पटौदी के रूप में राजीव को मिली हार से साफ था. हालांकि, यह चुनाव राजीव गांधी के जिंदगी का भी आखिरी चुनाव साबित हुआ था.