इन्दौर । दुर्लभ मनुष्य जीवन की धन्यता परोपकार और परमार्थ के सदकर्मों में होती है। क्रोध, लोभ और मोह जैसे अवगुण बिना किसी स्कूल-कॉलेज में गए स्वतः आ जाते हैं लेकिन धर्म और अध्यात्म की शिक्षा के लिए सत्संग रूपी ज्ञान केंद्र में जाना जरूरी होता है। भगवान ने दया, धर्म, ज्ञान और भक्ति जैसे गुण मनुष्य को ही दिए हैं, पशुओं को नहीं। राम और कृष्ण भारत भूमि के प्राणतत्व हैं जिनके बिना हम अपनी संस्कृति की कल्पना भी नहीं कर सकते।
बड़ा गणपति, पीलियाखाल स्थित प्राचीन हंसदास मठ पर चल रहे भागवत ज्ञानयज्ञ सप्ताह में वृंदावन के भागवताचार्य पं. ऋषभदेव महाराज ने उक्त बातें कही। कथा में मठ के महामंडलेश्वर स्वामी रामचरणदास महाराज के सान्निध्य में कृष्ण जन्मोत्सव भी धूमधाम से मनाया गया। जैसे ही वसुदेव और देवकी नन्हें बालक कृष्ण को लेकर कथास्थल पहुंचे, नंद में आनंद भयो... और आलकी की पालकी जय कन्हैयालाल की... जैसे भजनों पर गरबा नृत्य करते हुए श्रद्धालु झूम उठे। माखन मिश्री और बिस्किट टॉफी की वर्षा के बीच भक्तों ने उत्सव का आनंद लिया। यह कथा 21 सितंबर तक प्रतिदिन दोपहर 3 से 6 बजे तक होगी। प्रारंभ में पं. पवन शर्मा, संजय मिश्रा, पिंटू शर्मा, वीरेंद्र शर्मा, कैलाश गोवला आदि ने व्यासपीठ का पूजन किया। संध्या को आरती में सैकड़ो भक्तों ने भाग लिया। कथा में शुक्रवार 20 सितंबर को रूक्मणी विवाह, 21 को सुदामा चरित्र के साथ कथा का समापन होगा।
भगवान की बाल लीलाओं का वर्णन करते हुए भागवताचार्य ने कहा कि हमारे पास भोग विलास के तमाम साधन होते हुए भी हम स्वयं को दुःखी बताते रहते हैं। सुख और शांति मन की संतुष्टि पर निर्भर है। लालसाओं और कामनाओं का कभी अंत नहीं होता। हर व्यक्ति किसी न किसी कारण स्वयं को दुःखी मानकर चलता है जबकि भगवान की ओर से किसी को भी दुःख पहुंचाने का प्रावधान है ही नहीं। स्वयं भगवान का अवतरण भी प्राणीमात्र को सुख पहुंचाने के लिए हुआ है। भगवान का जन्म नहीं, अवतरण होता है। राम और कृष्ण के बिना इस देवभूमि की कल्पना भी संभव नहीं हैं।