अनीति का विरोध  वही व्यक्ति कर सकता है जो जिंदा है_वास्तविक रुप से अनीति का विरोध करना मानवता का अत्यंत पवित्र कर्तव्य है। जब तक आप अनीति का विरोध नहीं करते_तब तक आप नीति के समर्थक नहीं हो सकते। अनीति का विरोध चार प्रकार से किया जाता है_अनीति पूर्ण कार्य करने वालों का असहयोग कर_ उनकी निंदा कर_ उनका विरोध कर और उनसे संघर्ष कर ।

     राष्ट्रीय के प्रत्येक नागरिक को अनीति पूर्ण कार्य करने वालों का सहयोग नहीं करना चाहिए । उनसे दूर रहें। किसी भी लोभ या भय के कारण ऐसे लोगों का समर्थन नहीं करें । अनीति पूर्ण कार्य करने वालों की निंदा करते रहना चाहिए।जिससे समाज में दुष्ट प्रवृत्ति करने वाले लोगों के मन में भय बना रहे।

      अनीति पूर्ण कार्य करने वालों को सफल ना होने दें, उनके अनैतिक कार्यों में अवरोध उत्पन्न करें। अंतिम चरण है_संघर्ष, डट कर मुकाबला करें_धर्म युद्ध में आघातों का मुकाबला प्रसन्नतापूर्वक करें ।

          गांधी जी ने अंग्रेजों की अनीतियों का मुकाबला सबसे पहले 1919 में असहयोग आंदोलन किया___1930 में सत्याग्रह आंदोलन के माध्यम से निंदा कर, धरना देने, कानून तोड़ने एवं प्रतिरोध खड़ा करने के अनेक कार्यक्रम थे । 1942 में "करो या मरो" अभियान अत्यंत उग्र हुआ उसमें हिंसा या अहिंसा के सभी प्रतिबंध हटा दिए गए । 1947 में अनीति पूर्ण नीतियों के खिलाफ धर्म युद्ध का आवाहन किया गया। ताकि धर्म की स्थापना हो सके। 

       अत्यंत सीधापन और सज्जनता भी कायरता है। उसे अनीति पूर्ण कार्य करने वाले भोलापन को बेवकूफी या कायरता समझ बैठते हैं । दुष्टों को दंड से ही सन्मार्ग पर लाया जा सकता है। नर पशुओं को भी डंडे के बल पर ही सुधारा जा सकता है। 

करहिं उपद्रव असुर निकाया । नाना रूप धरहिं करि माया ।
जिनके अस  आचरन भवानी । ते जानेहु निसिचर सब प्रानी ।

राम चरित्र मानस से हमें यह प्रेरणा मिलती है की अनैतिक तत्वों का समाज से उन्मूलन किया ही जाना चाहिए।