दुर्योधन ने पांडवों को मारने के लिए लाक्षा गृह का निर्माण करवाया था, लेकिन पांडव किसी तरह उससे बचकर भागने में सफल हो गए थे। ये बात तो सभी जानते हैं, लेकिन ये बात बहुत कम लोग जानते हैं कि लाक्षा गृह जाने से पहले महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को संकेतों की भाषा में ये बता दिया था कि जहां तुम जा रहे हो, वह स्थान तुम्हारे लिए सुरक्षित नहीं है। विदुर ने युधिष्ठिर को क्या कहा और उसका क्या अर्थ है, इसकी जानकारी इस प्रकार है-

श्लोक-1
अलोहं निशितं शस्त्रं शरीरपरिकर्तनम्।
यो वेत्ति न तु तं घ्नन्ति प्रतिघातविदं द्विष:।।
अर्थ- एक ऐसा तीखा शस्त्र है, जो लोहे का बना तो नहीं है, परंतु शरीर को नष्ट कर देता है। जो उसे जानता है, ऐसे उस शस्त्र के आघात से बचने का उपाय जानने वाले पुरुष को शत्रु नहीं मार सकते।
संकेत- यहां महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को ये कहा है कि शत्रुओं ने तुम्हारे लिए एक ऐसा भवन तैयार करवाया है, जो आग को भड़काने वाले पदार्थों से बना है। शस्त्र का शुद्ध रूप सस्त्र है, जिसका अर्थ घर होता है।

श्लोक-2
कक्षघ्न: शिशिरघ्नश्च महाकक्षे बिलौकस:।
न दहेदिति चात्मानं यो रक्षति स जीवति।।
अर्थ- घास-फूस तथा सूखे वक्षों वाले जंगल को जलाने और सर्दी को नष्ट कर देने वाली आग विशाल वन में फैल जाने पर भी बिल में रहने वाले चूहे आदि जंतुओं को नहीं जला सकती- यों समझकर जो अपनी रक्षा का उपाय करता है, वही जीवित रहता है।
संकेत- वहां जो तुम्हारा पार्श्ववर्ती (सेवक) होगा, वह पुरोचन (दुर्योधन के कहने पर पुरोचन ने ही लाक्षा गृह का निर्माण करवाया था) ही तुम्हें आग में जलाकर नष्ट करना चाहता है। तुम उस आग से बचने के लिए एक सुरंग तैयार करा लेना।

श्लोक-3
नाचक्षुर्वेत्ति पन्थानं नाचक्षुर्विन्दते दिश:।
नाधृतिर्बिद्धिमाप्नोति बुध्यस्वैवं प्रबोधित:।।
अर्थ- जिसकी आंखें नहीं हैं, वह मार्ग नहीं जान पाता, उसे सद्बुद्धि नहीं प्राप्त होती। इस प्रकार मेरे समझाने पर तुम मेरी बातों को भली-भांति समझ लो।
संकेत- महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को समझाया कि दिशा आदि का ठीक ज्ञान पहले से ही कर लेना, जिससे रात में भटकना न पड़े।

श्लोक-4
अनाप्तैर्दत्तमादत्ते नर: शस्त्रमलोहजम्।
शवाविच्छरणमासाद्य प्रमुच्येत हुताशनात्।।
अर्थ- शत्रुओं के दिए हुए बिना लोहे के बने शस्त्र को जो मनुष्य ग्रहण कर लेता है, वह साही के बिल में घुस कर आग से बच जाता है।
संकेत- उस सुरंग से यदि तुम बाहर निकल जाओगे तो लाक्षा गृह में लगी हुई आग से बच जाओगे।

श्लोक-5
चरन् मार्गन् विजनाति नक्षत्रैर्विन्दते दिश:।
आत्मना चात्मन: पंच पीडयन् नानुपीडयते।।
अर्थ- मनुष्य घूम-फिरकर रास्ते का पता लगा लेता है, नक्षत्रों से दिशाओं को समझ लेता है तथा जो अपनी पांचों इंद्रियों का स्वयं ही दमन करता है, वह शत्रुओं से पीड़ित नहीं होता।
संकेत- महात्मा विदुर ने युधिष्ठिर को समझाया कि यदि तुम पांचों भाई एकमत रहोगे तो शत्रु तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते।