नई दिल्ली। गलवान झील में गतिरोध वाली जगह से पांच किमी की दूरी पर सैनिकों को इकट्ठा करने वाली चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी को अब अपने सैनिकों को वापस बुलाना पड़ सकता है। ऐसा इसलिए करना होगा, क्योंकि झील के जल स्तर में इजाफा हुआ है। झील के किनारे में बाढ़ के हालात बन गए हैं। गलवान को जानने वाले शख्स ने यह जानकारी हिन्दुस्तान टाइम्स को दी है।एक वरिष्ठ सैन्य कमांडर ने कहा कि अक्साई चिन क्षेत्र से आने वाली बर्फीले-ठंड के बाद गलवान घाटी बर्फ से ढंक गई थी जो तापमान में वृद्धि के कारण पिघल रही है और  गलवान नदी का जल स्तर तेजी से बढ़ गया है। तेज गति से बर्फ पिघलने से नदी के तट की स्थिति खतरनाक हो गई है। उपग्रह और ड्रोन ने नदी के तट पर चीनी टेंटों के बढ़ने का संकेत दिया था।भारत और चीन की सेना के वरिष्ठ अधिकारियों को बीच पांच मई से शुरू गतिरोध को कम करने के लिए तीन राउंड बातचीत हो चुकी है। इस तरह की कवायद शुरू करने पर व्यापक समझौते भी हुए। लेकिन पहले समझौते के दस दिन बाद यानी 15 जून को दोनों देशों के सैनिकों के बीच हिंसक झड़प हुई। लेकिन सैन्य कमांडर ने कहा कि चीन के लिए गलवान, गोगरा, हॉट स्प्रिंग्स और पैंगोंग त्सो में वर्तमान पोजिशन को बरकरार रखना कठिन होगा। उन्होंने कहा कि अगर चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर स्थिति को बहाल नहीं करता है तो गतिरोध सर्दियों के महीनों में भी जारी रह सकता है।

पीएम मोदी के लद्दाख दौरे ने दिए स्पष्ट संदेश
रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लद्दाख का दौरा करके बहुत स्पष्ट संदेश दिया है कि भारत पूर्वी लद्दाख में पीछे हटने वाला नहीं है। वह दृढ़ता से हालात से निपटेगा और उसके सशस्त्र बल देश के भूभागों की रक्षा के लिए ठोस दृष्टिकोण अपना रहे हैं। यह भी कहा कि चीन लद्दाख, दक्षिण चीन सागर और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक सैन्य मौजदूगी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है और समय आ गया है कि भारत हालात का फायदा उठाए।